>>: Something different: पातालकोट में अनोखी होली, महिलाएं फूल से बनाती हैं रंग, वसूलती हैं फगुआ

>>

Patrika - A Hindi news portal brings latest news, headlines in hindi from India, world, business, politics, sports and entertainment!

छिंदवाड़ा. रंगों का त्योहार होली सोमवार को धूमधाम से मनाई जाएगी। बुराई पर अच्छाई के जीत के तौर पर मनाए जाने वाले इस पर्व पर लोग अपने सभी गिले-शिकवे भुलाकर प्रेम और सद्भाव के साथ एक-दूसरे के साथ रंग खेलते हैं। होली के दिन लोग बड़े-छोटे और अमीर-गरीब का भेद भुलाकर लोगों के साथ रंग वाली होली खेलते हैं। हालांकि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से भी होली खेली जाती है। इसी में एक जगह है तामिया का पातालकोट। आदिवासी बाहुल्य जिला छिंदवाड़ा में इस अनोखी होली की पूरे देश में चर्चा होती है। होली को लेकर आदिवासी समाज अलग तरह की परंपरा निभाता है। प्राकृतिक सौंदर्य समेटे तामिया के पातालकोट में आदिवासी, भारिया जाति के लोग कई सालों से अनोखी होली मनाते चले आ रहे हैं। यहां होलिका दहन के अगले दिन धुरेंडी में महिलाओं की टोली आदिवासी संस्कृति में फाग गाकर फगुआ वसूलती है। इसके बाद ही रास्ते से गुजर रहे पुरुषों को तिलक लगाकर छोड़ती है। सालों से ये परंपरा चली आ रही है।

पुरुष एवं महिलाओं की अलग-अलग टोली
होली के दिन इस क्षेत्र में निवासरत पुरुष की टोली ढोल-बाजे के साथ निकलती है। टोली गांव के हर घर जाती है और गाना-बजाना होता है। सभी लोग एक दूसरे से मस्ती मजाक करते हैं। अबीर-गुलाल एवं रंग भी लगाते हैं और फगुआ लेकर आगे बढ़ जाते हैं। वहीं महिलाओं की टोली हाथ में तिलक वाली थाल लेकर घर-घर जाती हैं। फगुआ के गीत गाती हैं और फिर आगे बढ़ जाती है। एक-एक घर जाने के बाद वह गांव के एक छोर पर खड़े होकर आने-जाने वालों को रोकती हैं, उनके साथ हंसी-ठिठोली करती हैं और तिलक लगाकर फगुआ लेती हैं।

कोरोना काल में बदला था स्वरूप
वर्ष 2019 में कोरोना संक्रमण के चलते परंपरा का स्वरूप बदल गया था। लोगों ने प्रतिकात्मक तौर पर होली पर्व मनाया था। हालांकि सालों पुरानी परंपरा लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है। यहां पुरुष और महिलाएं होली के दिन परंपरा मानते हुए एक साथ बैठकर हाथों से बनाई हुई महुआ की कच्ची शराब पीते हैं।

टेसू के फूल से रंग बनाकर खेलते हैं होली
क्षेत्र में समय बीतने के साथ परंपराएं पहले जैसी नहीं रही हैं, लेकिन बुजुर्ग लोग अभी तक इस प्रकार की परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। वहीं क्षेत्र के कसोतिया, चिमटीपुर, सिदोली, खुर्सीढाना, सालीवाड़ा, मरकाढाना गांव में भारिया आदिवासी लोग आज भी प्राकृतिक होली खेलते हैं। टेसू के फूल से रंग बनाकर बांस की पिचकारी में भरकर लोगों पर छिडक़ते हैं। वहीं चेहरों पर पीली मिटटी लगाते हैं।

You received this email because you set up a subscription at Feedrabbit. This email was sent to you at mpnews661@gmail.com. Unsubscribe or change your subscription.