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बुंदेलखंड का बदलता खान-पान कर रहा किडनी खराब, तेजी से बढ़ रहे मरीज Tuesday 26 March 2024 04:35 PM UTC+00
हालात ये बन रहे हैं कि क्षेत्र में पिछले 3 साल में किडनी ट्रांसप्लांट के केस आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गए हैं। पहले जहां हर साल 3-5 परिवार स्वजनों को किडनी डोनेट करने मेडिकल बोर्ड के पास अनुमति लेने आते थे जिसकी संख्या अब 13-16 तक पहुंच गई है। किडनी ट्रांसप्लांट के लिए संभागीय मुख्यालय में बाकायदा एक मेडिकल बोर्ड बैठता है जो केस की स्टडी करके ही मंजूरी देता है। मरीज और दानदाताओं से हर पहलु पर पूछताछ होती है। परिवार की आर्थिक स्थितियां खंगाली जाती हैं। मेडिकल कॉलेज में हर माह होने वाली बैठक में पिछले 3 साल में 43 परिवार किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति के लिए पहुंचे हैं। जिसमें से 20 केस जनवरी 2023 से अब तक 15 माह में सामने आ चुके हैं। इसमें सबसे चौकाने वाली बात ये हैं कि 43 में से 70 प्रतिशत मरीज दमोह जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से सामने आए हैं, जहां स्वास्थ्य विभाग द्वारा अध्ययन की जरूरत बताई जा रही है। सामान्य व्यक्ति की किडनी भी दे रहीं जवाब- बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स की माने तो कुछ साल पहले तक छतरपुर, टीकमगढ़, दमोह, सागर और पन्ना जिले के गिनती के किडनी ट्रांसप्लांट के आवेदन आते थे, लेकिन अब लगातार इजाफा हो रहा है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ गुटखा या नशा करने वालों की किडनी खराब हो रहीं हों, कई ऐसे केस आए जो बीड़ी, तंबाकू, शराब का सेवन भी नहीं करते और उनकी दोनों किडनी खराब हो गईं। ताजा कुछ ऐसे मामले भी आए जिसमें 18 व 20 साल के बच्चों की दोनों किडनी खराब हो गईं। इसका प्रमुख कारण पेस्टिसाइड का लगातार सेवन व प्लास्टिक के उपयोग की बन चुकी दिनचर्या है। काम नहीं आता आयुष्मान कार्ड, बिक जाते हैं घर-द्वार- आयुष्मान कार्ड में किडनी का इलाज नि:शुल्क न होने के कारण मरीज और उसके परिजन आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। चंद महीनों के इलाज में ही परिवार पर इलाज का खर्चा हावी हो जाता है। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी जमीन-मकान बिक चुके हैं। ऐसे में परिवार पर एक साथ कई मुसीबतें हावी हो जाती हैं। कुछ मामलों में परिवार के साथ-साथ रिश्तेदार भी मदद करते हैं लेकिन मदद की एक निश्चित सीमा मरीजों को मदद मिल पाती है। डायलिसिस की सीमा, अंतिम विकल्प ट्रांसप्लांट- डॉक्टर्स की माने तो दोनों किडनी खराब हो जाने के बाद मरीज सिर्फ डायलिसिस से जीवित रहता है। डायलिसिस में मशीन से रक्त को साफ करके शरीर में भेजा जाता है। शुरूआत में सप्ताह में 1 बार फिर सप्ताह में 2 से 3 बार तक डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। लेकिन डायलिसिस सहने की शरीर की भी एक सीमा होती है। ऐसे में केस क्रिटिकल हो जाता है और अंतिम विकल्प किडनी ट्रांसप्लांट ही बचता है। -गुटखा पाउच में मौजूद घातक केमिकल किडनी के छेद को खराब कर देते हैं। -बोतल बंद पानी, प्लास्टिक पैक खाद्य सामग्री से प्लास्टिक के कण शरीर में पहुंच जाते हैं। -पेस्टीसाइड दवा सब्जी, अनाज और जल स्त्रोतों से शरीर में पहुंच रही। -कागज के डिस्पोजल में भी प्लास्टिक लेयर होते है गर्म चाय बेहद नुकसान दायक। -ओवन में खान गर्म करना, फ्रीज में प्लास्टिक बोतल पानी नुकसान देय है। -प्लास्टिक बोतल, पैकेट में बंद दूध बच्चों को नुकसान दायक। फैक्ट फाइल- 15 माह में 20 केस को मेडिकल बोर्ड से मिली मंजूरी 6 मामले जहां पत्नी ने पति को किडनी दी 5 केस जहां मां ने संतान को किडनी दान की 2 मामलों में पिता ने बच्चों के लिए किडनी दी 3 केस में चाचा ने भतीजे को किडनी देने मंजूरी मांगी 4 मामले 2024 के 3 माह में आए। -गौरझामर क्षेत्र के भजिया गांव निवासी 44 वर्षीय किसान पति कमलेश लोधी की दोनों किडनी खराब हो गईं और 30-40 लाख रुपए खर्च करने के बाद भी जब पति की जान पर बन आई तो पत्नी आशा बाई ने अपनी किडनी दी। -दमोह जिले के दो प्रकरणों में महिलाओं ने पति के लिए अपनी किडनी देकर नया जीवनदान दिया। दमोह के बजरिया निवासी 24 वर्षीय नवविवाहिता ने पति की जान बचाने अपना जीवन दाव पर लगा दिया। वहीं 37 वर्षीय महिला ने भी किडनी देकर पति की जान बचाई। -टीकमगढ़ जिले के पलेरा निवासी 52 वर्षीय महिला ने पति की दोनों किडनी खराब हो जाने पर अपनी एक किडनी दान की। -देवरी के रसेना गांव निवासी ग्रामीण की दोनों किडनी खराब हो गईं और परिवार सालों तक इलाज के लिए महानगरों के चक्कर काटता रहा। बार-बार होते डायलिसिस से पति का शरीर जवाब देने लगा तो 33 वर्षीय महिला पति की रक्षा के लिए आगे आई और किडनी देकर नया जीवन लिया। एक्सपर्ट व्यू: डॉ. वंदना गुप्ता सदस्य मेडिकल बोर्ड बीएमसी। -3 साल से किडनी प्रत्यारोपण के केस लगातार बढ़ रहे हैं। औसत हर माह 1-2 परिवार किडनी प्रत्यारोपण की अनुमति मांग रहे हैं। मेडिकल बोर्ड का सदस्य होने के नाते प्रत्येक मरीज से उनकी आदत, रहन-सहन, खान-पानी की जानकारी लेते हैं। अधिकांश मरीजों में पेस्टीसाइड, गुटखा व नशा, बॉडी में प्लास्टिक कण, गंदा पानी किडनी डेमेज का प्रमुख कारण होता है। वहीं संभाग में करीब 70 प्रतिशत केस दमोह के होते हैं, इस पर अध्ययन जरूर होना चाहिए कि आखिर दमोह में किडनी फेलियर के केस क्यों बढ़ रहे हैं। पहले मिट्टी व धातु के बर्तनों का उपयोग खाद्य सामग्रियों के लिए होता था, अनाज उत्पादन के लिए गोबर की खाद डाली जाती थी। प्लास्टिक पैक खाद सामग्री नहीं मिलती थी लेकिन अब खाद्य पदार्थ प्लास्टिक पैकिंग में आ रहे हैं। खेती में रसायनों का उपयोग बढ़ गया है, जिसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। |
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