शहडोल. आदिवासी बाहुल्य जिले शहडोल में ठंड बढऩे के साथ ही बच्चोंको निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी ने जकडऩा प्रारंभ कर दिया है। गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव इन बच्चों की मौत का कारण बन रहा है। ग्रामीण अंचलों में लाखों-करोड़ों खर्च कर स्वास्थ्य केन्द्र की इमारतें तो खड़ी कर दी गई हैं लेकिन चिकित्सक व सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है। ऐसे में ये स्वास्थ्य केन्द्र सिर्फ प्राथमिक उपचार तक ही सीमित रह गए हैं। हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के साथ ही बच्चों को रेफर कर दिया जाता है। ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक व उपस्वास्थ्य केन्द्र से ये बच्चे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफर किए जाते हैं और वहां से फिर जिला चिकित्सालय या मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से लडखड़़ाई हुई है।
सिविल अस्पताल ब्यौहारी में पद खाली
जिला मुख्यालय से लगभग 90 किमी दूर ब्यौहारी स्थित सिविल अस्पताल की बात की जाए तो यहां भी हालात जस के तस ही हंै। कहने को तो यहां शिशु रोग विशेषज्ञ के दो पद स्वीकृत हैं, लेकिन पदस्थापना एक भी विशेषज्ञ की नहीं है। यहां लगभग 50-60 किमी दूर, पपौंध, बाणसागर, बुड़वा, निपनिया सहित अन्य प्राथमिक व उपस्वास्थ्य केन्द्र से बच्चे रेफर होकर पहुंचते हैं और बाद में उन्हे यहां से मेडिकल कॉलेज या फिर जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया जाता है। बीमार बच्चे को लेकर उसके परिजन 120-130 किमी की दौड़ लगाते हैं तब कहीं जाकर उसे समुचित इलाज मिल पाता है।
अस्पताल में नहीं मिल रहा समुचित इलाज
जिला मुख्यालय से लगभग 100 किमी दूर स्थित झींकबिजुरी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र से घिरा हुआ है। यहां के आदिवासी परिवार इलाज के लिए इसी स्वास्थ्य केन्द्र पर निर्भर है। इसके बाद भी गांव में कोई बच्चा बीमार पडता है तो परिजनों को थक हार कर 100 किमी दूर जिला चिकित्सालय या मेडिकल कॉलेज ही दौड़ लगानी पड़ती है। यहां न तो कोई बच्चों के समुचित इलाज के लिए चिकित्सक हैं और न ही सुविधाएं।
रेफरल सेंटर बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
ग्रामीण अंचलों में संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने केंद्र तो खोल दिए गए हैं लेकिन यहां न डॉक्टर पदस्थ हैं और न ही समुचित सुविधाएं हैं। ऐसे में यहां इलाज के लिए आने वाले बच्चों को सीधे हायर सेंटर के लिए रेफर कर दिया जाता है।
बढ़ रहा दबाव, स्टॉफ की कमी
संभागीय मुख्यालय स्थित जिला चिकित्सालय व मेेडिकल कॉलेज में संचालित एसएनसीयू व पीआईसीयू में ठंड बढऩे के साथ ही दबाव बढ़ जाता है। यहां शहडोल, उमरिया, अनूपपुर के साथ ही डिंडौरी और छत्तीसगढ़ से लगे क्षेत्र के बच्चे भी इलाज के लिए रेफर होकर पहुंच रहे हैं। बढ़ते दबाव के बीच इन दोनों प्रमुख स्वास्थ्य केन्द्रों में भी चिकित्सकों की कमी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। जिला चिकित्सालय में शिशु रोग विशेषज्ञ के कुल 7 पद स्वीकृत हैं, इसमें से सिर्फ 4 ही भरे हैं। इसके अलावा 3 संविदा व एक पीजीएमओ की पदस्थापना की गई है। मेडिकल कॉलेज में 20 बेड के एसएनसीयू वार्ड में 50-60 बच्चे और 10 बेड का पीआईसीयू भी फुल है। यहां 2 शिशु रोग विशेषज्ञ व 2 एसआर पदस्थ है। यहां स्टॉफ की मांग लगातार की जा रही है लेकिन अब तक पदस्थापना नहीं हो पाई है।
शिशु रोग विशेषज्ञ के पद ही स्वीकृति नहीं
ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं सुदृढ़ करने के लिए कुल 7 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ङ्क्षसहपुर, बुढ़ार, गोहपारू, धनपुरी, झींकबिजुरी, जयसिंहनगर व वनसुकली संचालित हैं। इनमें से छह सीएचसी में शिशु रोग विशेषज्ञ के पद ही स्वीकृत नहीं हंै, सिर्फ जयसिंहनगर में एक पद स्वीकृत है। ऐसे में कोई बच्चा गांव से बीमार होकर सीएचसी पहुंचता भी हैं तो उसे यहां समुचित इलाज मुहैया नहीं हो पाता है।
सर्दी, जुकाम का इलाज ही संभव
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र से लगे जैतपुर स्वास्थ्य केन्द्र की बात की जाए तो यहां इलाज के लिए आने वाले बच्चों का सिर्फ प्राथमिक उपचार ही संभव है। सर्दी, खांसी या दस्त लगने पर सिरप दे दी जाती है। बात इससे आगे बढ़ी तो सीधे बुढ़ार सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र रेफर कर दिया जाता है और वहां से जिला चिकित्सालय या मेडिकल कॉलेज के लिए बच्चे रेफर कर दिए जाते हैं।
इनका कहना
पत्राचार किया जा रहा है, डॉक्टरों की पदस्थापना हो रही है। बच्चों को बेहतर इलाज मिले, हरसंभव प्रयास है।
डॉ एके लाल, सीएमएचओ, शहडोल