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कैकेयी ने सीता को मुंहदिखाई में क्या दिया था, जानें कैसा था वह अनमोल तोहफा Sunday 21 January 2024 05:34 AM UTC+00 | Tags: religion-and-spirituality स्वयंवर में श्रीराम ने भगवान शिव के धनुष को तोड़ दिया और इसी के साथ सीताजी के साथ विवाह के अधिकारी भी हो गए। चूंकि राम ने स्वयंवर की शर्त जीत ली थी इसलिए राजा जनक ने सहर्ष सीताजी का हाथ उन्हें थमा दिया। जनकपुरी में बड़े धूमधाम से दोनों का विवाह करवाया गया। विवाह के बाद जब सीताजी पहली बार ससुराल आईं तो उनकी मुंहदिखाई में स्वर्ण-रत्न-मणियों के ढेर लग गए लेकिन सबसे अनमोल तोहफा दिया महारानी कैकेयी ने। रामायण और श्रीरामचरित मानस में उल्लेख है कि सीताजी के विवाह के लिए राजा जनक ने स्वयंवर का आयोजन कराया। यहां शर्त रखी गई थी जो शिव धनुष तोड़ेगा उसी के साथ सीताजी का विवाह होगा। राम ने शिवजी के धनुष को तोड़ा और तब राजा जनक ने सीताजी से विधिविधान से उनका विवाह करा दिया। तुरंत फल देती है मां काली की साधना, जानें उनका प्रिय दिन और मंत्र विवाह के बाद राम और सीता कई दिनों तक जनकपुरी में ही रहे। इसके बाद वे अयोध्या आए। पहली बार ससुराल आई सीताजी को मुंहदिखाई की रस्म में कई मूल्यवान जेवर, रत्न, माणिक्य आदि दिए गए। अयोध्या की महारानी कौशल्या ने भी अपनी प्रिय बहू सीता का स्वागत किया और मुंहदिखाई की रस्म भी निभाई। इस मौके पर रानी कैकेयी ने भी सीताजी की मुंहदिखाई की और उन्हें सबसे अनमोल तोहफा दिया। दरअसल कैकेयी ने सीता माता को मुंहदिखाई में एक भव्य और खूबसूरत भवन भेंट किया था। यह भवन सोने का था और इसमें रत्न भी लगे थे। सोने से निर्मित होने के कारण इस भवन को कनक भवन के नाम से जाना जाता था। कनक भवन आज भी अयोध्या में मौजूद है। कनक भवन का एमपी के टीकमगढ़ से खास कनेक्शन है। यहां की रानी वृषभानु कुंअर ने ही कनक भवन का जीर्णाेद्धार कराया था। यह भी पढ़ें: समुद्र में 300 फीट की गहराई में है श्री कृष्ण की द्वारिका टीकमगढ़ के राजा प्रताप सिंह जूदेव की पत्नी रानी वृषभानु अयोध्या गईं तो कनक भवन की दुर्दशा देख वे दुखी हो उठीं थीं। इतिहासकारों के अनुसार सन 1887 में वे फिर अयोध्या गईं और कनक भवन के तत्कालीन महंत लक्ष्मणदास से इसके जीर्णाेद्धार की इच्छा व्यक्त की। उनकी मंजूरी के बाद रानी ने ओरछा के इंजीनियर व कारीगरों को अयोध्या ले जाकर कनक भवन का दोबारा निर्माण कराया। करीब चार साल में नया कनक भवन बनकर तैयार हुआ। 1891 में यहां विधि विधान से राम की मूर्ति स्थापित कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। त्रेता युग में जब पहली बार कनक भवन बनवाया गया था तब भी यह अनूठा था। पौराणिक ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख है कि कैकेयी को कनक भवन बनाने का विचार सपने में दर्शन के माध्यम से आया। दरअसल राजा दशरथ श्रीराम और सीता के लिए अयोध्या में सुंदर भवन बनवाना चाहते थे। उसी दौरान कैकेयी को सपने में कनक भवन दिखा जिसके बारे में उन्होंने राजा दशरथ से चर्चा की। यह भी पढ़ें: शादी में हो रहा विलंब या आता है तेज गुस्सा तो इस मंदिर में जरूर करें पूजा कैकेयी को सपने में दिखी छवि के आधार पर दशरथ ने कनक भवन बनवाया था। सोने के इस सुंदर भवन का निर्माण दशरथ के आदेश पर शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। जब सीता विवाह के बाद पहली बार अयोध्या आई तो कैकेयी ने उन्हें रत्नों से जड़ा हुआ सोने का यह भवन मुंह दिखाई में भेेंट कर दिया। Tags:
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